अस्ताचलगामी हो जाना भारतीय राजनीति के सूर्य का – पंकज झा

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1985 के शुरुआत की बात है. श्रीमती इंदिरा गांधी की दुखद हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में नवोदित भाजपा मात्र दो सीटों तक सिमट कर रह गयी थी. तब ऐसा लगा था मानो पार्टी का अस्तित्व शुरू होते ही ख़त्म हो गया हो. सर मुड़ाते ही ओले पड़े हो जैसे. ऐसे नैराश्य के समय में एक दिन पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक शांता कुमार अटल जी के यहां किसी कार्यक्रम का आमंत्रण देने पहुचे थे. संवेदनशील अटल जी ने दो टुक मना करते हुए कहा था कि अब किसी राजनीति का कोई अर्थ नहीं है. क्या करेंगे लोगों के बीच जा कर? शांता कुमार ने उन्हें समझाते हुए कहा था कि पार्टी से जुड़े जितने भी लोग हैं, उन सबके पास कोई न कोई काम है, उन सबके पास अपना घर-परिवार है. सब अपने जीवन में व्यस्त हो जायेंगे. लेकिन अटल जी के पास तो कुछ भी नहीं है ऐसा. अगर राजनीति में सक्रिय नहीं रहेंगे तो करेंगे क्या वे आखिर? बात अटल जी को जंच गयी और नए सिरे से फिर से निकल पड़े थे वे तूफानों में दीया जलाने का संकल्प लिए. उसके बाद का तो खैर सब कुछ इतिहास ने सुनहरे हर्फों में सब कुछ लिख कर रख ही लिया है अटल जी के बारे में. आप स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति में से अटल जी को हटा दें, देख लीजिये कितना कम कुछ रह जाएगा तब आपके पास बताने को. गोया एक भरे-पूरे शरीर में से उसकी आत्मा निकाल दी गयी हो. भरी दुपहरी मानो सूरज ने अनुपस्थित होकर अंधियारा बिखेर दिया हो.

निश्चय ही अटल जी का जाना राजनीति के क्षितिज पर शुचिता और औदार्य के एकमात्र सूरज का अस्ताचलगामी हो जाना है. आखिर सत्ता प्राप्ति की लिप्सा को एकमात्र साध्य मान लेने को ‘राजनीति’ कहे जाने वाले वक्त में ‘न भीतो मरणादस्मि, केवलम दूषितो यशः (मृत्यु से नहीं, अपयश से डरता हूं)’ कहते हुए इस्तीफा हाथ में ले कर राष्ट्रपति भवन पहुच जाने वाले व्यक्तित्व का कोई दूसरा उदाहरण कहां से लायेंगे आप?

बताइये भला, राजनीति में रचा-बसा-पगा, रग-रग समर्पित किया हुआ कोई युगपुरुष एक बाल सुलभ डर के साथ प्रभु से कभी ज्यादा ऊंचाई नहीं दे देने की मांग करता हुआ नज़र आये, ऐसा कभी और हुआ है क्या? इस भय से कोई ज्यादा ऊंचाई तक नहीं पहुंचना चाहे क्यूंकि उसके बाद फिर वह अपनों को गले नहीं लगा पायेगा, मानो कंधे पर झोला लटकाए कोई बच्चा बार-बार पिता की साइकिल से कूद कर उतर जाना चाहता हो कि वो स्कूल नहीं जाएगा. ऐसी संवेदना, ‘अपनों’ के लिए इतना अगाध प्यार, ‘अपनापन’ की इतनी व्यापक परिभाषा, वसुधा को ही कुटुंब समझ लेने की भारतीय संस्कृति से होली के रंगों की तरह सराबोर, अटल जी अब हमारे बीच नहीं हैं. वे अटल जी जिन्हें राजनीति की रपटीली राहें कभी डिगा नहीं पायी कर्तव्यपथ से. तारीख का हर इम्तहान जिन्हें कुंदन ही बनाता रहा.
अपने-आपमें यह अजूबा ही है कि राजनीति के जिस डगर पर लोग चलते ही इसलिए हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा ‘ऊंचाई’ हासिल कर जल्द से जल्द अपनों के ही गले में फंदा डाल सकें, वहां कोई एक कविमन राजनेता अपने इश्वर से यह प्रार्थना करता है कि उसे ज़मीन पर ही रहने देना, नहीं करना है परवाज़ उसे किसी महत्वाकांक्षा के आसमान में. हालांकि यह भी सही है कि ऐसे विरले लोग जब फिर भी किसी ऊंचाई तक पहुंच ही जाते हैं, तब तक उनका कद उनके द्वारा धारित पद से इतना ज्यादा बड़ा हो जाता है, कि फिर प्रभुता कभी उन्हें मदांध नहीं कर पाता. कहते हैं, कोई व्यक्ति महान तभी हो सकता है जब उससे मिलने वालों को कभी अपनी कमतरी का अहसास नहीं हो. अटल जी जैसे राजनेता की महानता इसी बात में छिपी थी कि उनसे मिलने वाले किसी भी इंसान को कभी नहीं लगा होगा कि वह कहीं से भी कम महत्वपूर्ण है. छत्तीसगढ़ के मख्यमंत्री डा. रमन सिंह जी के कक्ष में लिखा वाक्य ‘आप मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं’ की प्रेरणा भी निस्संदेह अटल जी के व्यक्तित्व से ही ली गयी होगी. बहरहाल.

एक ऐसा अटल योद्धा जो सत्ता में रहकर भी स्थितिप्रज्ञ सा रहे. उस रपटीली राहों पर चलते हुए भी कभी खुद को फिसलने नहीं दिया. कीचड़ में भी कमल के सदृश खिले रहने को कभी केवल चुनाव निशान मात्र नहीं समझने वाले अटल जी अब हमारे बीच नहीं हैं, भरोसा नहीं होता. सत्ता में रहकर भी स्थितिप्रज्ञ हो जाने, उस कीचड़ में भी कमल के सदृश खिले रहने वाले अटल जी, क्या हार में क्या जीत में, किंचित भी भयभीत नहीं रहने वाले, संघर्ष पथ पर जो मिला यह भी सही वह भी सही, ऐसा केवल लिखने के लिए लिखते-कहते रहे हों, ऐसी बात नहीं है. लखनऊ के एक चुनाव की बात है. बार-बार एक पत्रकार उन्हें कहता रहा कि वे इस बार जीत नहीं पायेंगे, फिर क्या करेंगे वे? बार-बार पूछने पर अटल जी कह बैठे- नहीं जीतेंगे तो हार जायेंगे, इसमें क्या बात है…कहते हुए लोगों को मुस्कुराता छोड़ निकल गए थे प्रचार के लिए.
भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री रहे अटल जी के बारे में यही कहा जा सकता है कि अगर राजनीति जैसे संवेदनहीन क्षेत्र में चुटकी भर भी ‘साहित्य’ मिला दिया जाय तो वह कितना खुबसूरत हो सकता है, अटल जी का कृतित्व इसका जागता-जीता उदाहरण रहा. कवि, साहित्यकार, पत्रकार, राजनेता अटल जी मोटे तौर पर ‘अभिव्यक्ति के व्यक्ति’ के रूप में हमेशा लोगों के मानस पटल पर अमिट बने रहेंगे. राजनीति के अटल धुरंधर जीवन भर, एक से एक आक्षेप झेलते हुए भी हमेशा असहमति का मुस्कान के साथ स्वागत करते रहे. ऐसी कठिन साधना के बाद ही किसी युग को एक ऐसा नायक मिलता है जिसे अटल बिहारी वाजपेयी कहा जाता है.

युगपुरुष, राजनेता, लोकनायक, राजर्षि, स्टेट्समैन, पत्रकार, लेखक, कवि, प्रेरक, भारत का पहरुआ, विश्व में भारत का प्रसारक, संस्कृति का अग्रदूत और इनसे भी बढ़कर रग-रग में भरे हिंदुत्व के अपने परिचय को तमगा की तरह पहने, मुकुट की तरह सजाए उन्नत मस्तक और उभरा सीना के साथ पीड़ाओं में पलने, तूफानों से टकराने का साहस संचार करते हुए, कदम मिलाकर चलने का आह्वान करने वाले अटल जी लोकतांत्रिक भारत के इतिहास को एक अनोखा और अद्भुत उपहार के रूप में ही हमेशा याद किये जाते रहेंगे. राजनीति में साहित्य का चितेरा, विचारधारा में असहमति का ध्वजवाहक, संगठन में अपनेपन का अग्रदूत, दल में दिल की बात करने वाला हीरो, साहित्य में सहिष्णुता का राजदूत …तमाम विशेषण इस महानायक के लिए ज़रा कम ही साबित हो रहे हैं. छत्तीसगढ़ समेत तीन प्रदेशों के निर्माता राजनीति के देदीप्यमान इस नक्षत्र का समुचा जीवन ही राजनीति और समाज के लिए एक सन्देश की तरह ही है. भारत को मिले इस पुनीत सन्देश को ग्रहण करने की पात्रता अपने भीतर ले आ कर ही हम अटल जी को सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं. इस महामानव के प्रति अशेष कृतज्ञता ज्ञापन एक समृद्ध विरासत का गौरव भाव हम भारतीयों में एक युग तक सतत भरते रहने के लिए. आज उस युग का अवसान हो गया. भारतीय राजनीति का अटल काल हम सबके स्मृति में अनंत काल तक यथावत रहेगा.

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