ई-रिक्शा चलाकर पुरूषों का वर्चस्व तोड़ने में कामयाब रही गातापार की गायत्री

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संसाधनों के अभाव में भी खुद को स्थापित करने का जज्बा रखने वालों को अंततोगत्वा सफलता मिलती ही है, चाहे मार्ग मे कितनी भी बाधाएं क्यों न आएं। जरूरत है अपने अंदर छिपे हुनर को तराशकर उसे उपयोग में लाने की कुरूद विकासखण्ड के ग्राम गातापार में रहने वाली श्रीमती गायत्री साहू पर यह बात बिलकुल सटीक बैठती है, समाज की परम्पराओं और वर्जनाओं को तोड़कर तमाम नकारात्मक दायरों से बाहर आकर दोनों हाथों में ई-रिक्शा का हैण्डल थामे यात्रियों को लाने-ले जाने में गायत्री अपनी भूमिका निभा रही हैं, साथ ही परिवार के भरण पोषण में अपने पति के साथ बराबर की सहभागी बन रही हैं।

कुरूद के ग्राम गातापार की श्रीमती गायत्री साहू (28 वर्ष) पहले सिर्फ मनरेगा श्रमिक के तौर पर काम करती थीं।छत्तीसगढ़ शासन के ‘बिहान‘ कार्यक्रम के तहत साल 2016 में वह गायत्री महिला स्वसहायता समूह नामक एसएचजी से जुड़ीं तब पता चला कि छोटी-छोटी बचत करके खुद के पैसे को कैसे सृजनात्मक कार्य में लगाएं और आर्थिक गतिविधियों को अंजाम दें।इसी बीच तीन माह पहले फरवरी-2018 में देना आर-सेटी के माध्यम से ई-रिक्शा चालन के प्रशिक्षण के बारे में पता चला और 15 दिनों के भीतर उन्होंने रिक्शा चलाना भी सीख लिया। फिर बात आई रिक्शा खरीदने की, जिसकी कीमत डेढ़ से दो लाख रूपए थी। ऐसे में जिला पंचायत के अधिकारियों से सम्पर्क स्थापित करने के बाद अनुदान पर रिक्शा क्रय करने के बारे में जानकारी मिली, जिससे गायत्री का हौसला और बढ़ गया। एक लाख 90 हजार रूपए के ई-रिक्शे के लिए उन्हें सिर्फ 30 हजार रूपए की राशि ही जमा करनी पड़ी, क्योंकि इसके लिए एक लाख दस हजार रूपए रूर्बन से अनुदान के रूप में मिले और 50 हजार रूपए की सब्सिडी श्रम विभाग से प्राप्त हो गई। गायत्री के लिए शासन से मिला अनुदान ‘जिन खोजां तिन पाइयां‘की भांति हो गया। 20 फरवरी को कुरूद विकासखण्ड के ग्राम रामपुर में आयोजित रूर्बन मिशन के शुभारम्भ कार्यक्रम में पंचायत मंत्री श्री अजय चंद्राकर ने उन्हें रिक्शे की चाबी सौंपी और अपनी शुभकामनाएं देते हुए सतत् आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। तब से वह रोज धमतरी से कोर्रा के बीच सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक ई-रिक्शा चलाती हैं और सवारियों को उनके गंतव्य तक छोड़ती हैं। श्रीमती गायत्री ने बताया कि शुरू-शुरू में रिक्शा चलाने में थोड़ी झिझक महसूस जरूर होती थी, लेकिन अपने समूह की बातें याद करके सिर्फ अपने लक्ष्य को ध्यान में रखा।

अब वह आत्मविश्वास के साथ अपने हाथों में रिक्शे के हैण्डल को ऐसे नचाती हैं, जैसे वह कई सालों से रिक्शा चला रही हों। इस तरह समूह से जुड़ने और शासन की विभिन्न योजनाओं का लाभ लेकर गायत्री न सिर्फ पुरूष प्रधान समाज की परम्पराओं को तोड़ने में कामयाब रहीं, बल्कि ई-रिक्शा चलाकर अपने पति के साथ-साथ दो बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में जिम्मेदार मां होने का फर्ज निभा रही हैं।

  • ताराशंकर सिन्हा

 

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