कहानी धान की, कहानी हमारे अभिमान की

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कहानी धान की, कहानी हमारे अभिमान की। जानिए धान का मोह कैसे जुड़ा है एक छत्तीसगढ़िया के जीवन में।

चावल विश्व के 60 प्रतिशत से भी अधिक लोगों का प्रमुख आहार है और हर साल औसतन 14500 लाख टन चावल का उत्पादन पूरे विश्व में होता है। धान की उत्पत्ति के बारे में यह कहा जाता है कि धान लगभग 1300 लाख साल पहले एशिया में पाया गया था।

ऐसा कहा जाता है कि धान की उत्पत्ति उत्तर पूर्वी हिमालय क्षेत्र में हुई थी जहां से वह पहले एशिया महाद्वीप के अन्य क्षेत्रोँ में फिर क्रमशः पूरे विश्व में फैल गयी। यह भी लिखा गया है कि जब सिकंदर ने ईसा पूर्व 4थी शताब्दी में भारत को लूटा था तब वह अपने साथ धान भी ले गया था, एक अति महत्वपूर्ण प्राप्ति के रूप में। धान की प्राप्ति को मानव सभ्यता के विकास क्रम में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सोपान माना जाता है। छत्तीसगढ़ अपने धान के उत्पादन के लिए धान का कटोरा भी कहा जाता है। और यहाँ लगभग 300 लाख टन धान का प्रतिवर्ष उत्पादन होता है।

छत्तीसगढ़ एक धान उत्पादक और चावल उपभोगी राज्य है। यहां की संस्कृति अर्थात छत्तीसगढ़ वासियों की सम्पूर्ण जीवन शैली धान और चावल पर ही संधारित होती रही है। इस राज्य में देश के किसी भी क्षेत्र की तुलना में धान की सर्वाधिक प्रजाति पायी जाती हैं।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति में जीवन के प्रत्येक संस्कार में धान और चावल के उपयोग की अनिवार्यता है। जन्म के बाद शिशु को प्रसव कराने वाली दाई से धान भरे सूप में लिटाकर लेने से लेकर मृत्यु संस्कार में चावल से बने पिंड से पिंड दान तक हर सोपान में चावल की महत्ता है। रोजी मज़दूरी का भुगतान, विनिमय, दंड आदि अनेको पक्ष है जिसमे धान चावल ही उपयोग होता है। यह यहां का मुख्य आहार भी है। वस्तुतः छत्तीसगढ़ में भोजन को भात खाना ही कहा जाता है। खाना खाने के बारे मे यदि पूछना हो, तो कहा जाता है कि भात खा लिए क्या। निमंत्रण को भी पारंपरिक रूप भात खाने बुलाना ही कहा जाता रहा है। और कुछ किस्म के सामाजिक दंड भी भात खिलाने के रूप में हुआ करते थे। नौकर चाकर, पौनी पसारी की देनदारी का माध्यम भी धान ही हुआ करता है। इसी तरह से दान दक्षिणा और भिक्षा भी धान चावल के रूप में दिया जाता है। उदाहरण प्रसंग तो अनेको हैं, और इस पर तो एक बड़ा अध्याय ही लिखा जा सकता है।

इस राज्य के हर इलाके में चावल और सिर्फ चावल ही लोगों का मुख्य आहार रहा है और चूंकि यहां की पैदावार भी यही रही है इसलिए यहां बनाये जाने वाले व्यंजनों में चावल आधारित व्यंजनों की अधिकता है।

ढेंकी, मूसर, बहना कांडी, जांता, सूप, इत्यादि का उपयोग दरना, फ़ूनना, नीमारना, छरना आदि, धान से चावल बनाने की छत्तीसगढ़ में पारंपरिक तकनीकें है। चावल को पकाने के भी छत्तीसगढ़ में कई तरीके हैं जिसमें चोवा,अन्धन देकर पकाना,पैना का उपयोग कर पकाना आदि सम्मिलित हैं। मिट्टी, कांसे, पीतल इत्यादि के बर्तनों का प्रयोग छत्तीसगढ़ के पारंपरिक चावल पकाने के तरीकों में आता है।

धान के अच्छे उत्पादन या अच्छी फसल न होने पर यहां का लोकजीवन पूरी तरह से प्रभावित होता है। कुछ सालों पहले तक वर्षा ऋतु के समापन के लगभग अच्छी बारिश न होने के कारण खाने कमाने के लिए अन्यत्र रोजगार के लिए जाने वालों की रेल गाड़ियों में भीड़ आमबात हुआ करती थी। असम सहित देश विदेश में बसने वाले प्रवासी छत्तीसगढ़ी लोगो का उन स्थानों में गमन शायद धान के फसल के कमजोर होने से जुड़ा रहा होगा। और फसल अच्छी याने लंबित कामों को निबटाने का अवसर जिनमे शादी विवाह, घर बनाना, नई खरीददारी जैसे अनेक काम सम्मिलित रहते है।

धान को एक फ़सल के रूप में और लोगों को उसके उत्पादक और उपयोग कर्ता के तौर पर देखने का क्रम तो वर्षों से चला आ रहा है पर दोनों के अंतरसंबंधों को या फिर किस तरह से एक संस्कृति पूर्णतः धान या चावल पोषित होती है, इस पक्ष को जानने समझने का प्रयास नगण्य ही है।

लेख – अशोक तिवारी,
“संग्रहालय और संस्कृतिकर्मी।” (वर्तमान में सहपाडिया के साथ सलाहकार के रूप में काम कर रहे एक सेवानिवृत्त संग्रहालय क्यूरेटर।)

 

 

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