गौतम बुद्ध का छत्तीसगढ़ से कुछ ऐसा है सम्बन्ध

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छत्तीसगढ़ में बुद्ध का नाम जब लिया जाता है हमारी नज़रे सिरपुर की ओर देखने लगती है। हमे बताया जाता है वहाँ से निकली हुई बुद्ध मूर्तियों के बारे में, खुदाई में मिले बौद्ध विहार के बारे में।

पर क्या आपको पता है, असली कथा ? बुद्ध का ऐसा छत्तीसगढ़ कनेक्शन कैसे ?

पौराणिक काल का ‘कोसल’ प्रदेश, जो कि कालान्तर में ‘उत्तर कोसल’ और ‘दक्षिण कोसल’ नाम से दो भागों में विभक्त हो गया और ‘दक्षिण कोसल’ ही वर्तमान छत्तीसगढ़ कहलाता है। इन दोनों प्रदेशो में बुद्ध के समकालीन दो राजा हुए। उत्तर कोसल के प्रसेनजित और दक्षिण कोसल के विजयस।

सब कुछ शांति से चल रहा था, पर उत्तर के प्रसेनजित ने दक्षिण कोसल पर आक्रमण कर दिया, और अब दोनों तरफ से युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। यह युद्ध लंबे समय तक चलता रहा, और अंत होते-होते उत्तर कोसल के राजा प्रसेनजित हार की कगार पर आ पहुँचे। अब हार का डर उन्हें गौतम बुद्ध के पास ले पहुँचा। प्रसेनजित ने बुद्ध से आग्रह किया कि वह मध्यस्थ बने और दोनों राज्यों के मध्य संधि कराने का प्रयास करे।

गौतम बुद्ध वाराणसी में प्रसेनजित से मिले, तथा उन्हें उपदेश दिया, उसके बाद प्रसेनजित को पश्चयताप हुआ और वह संघराम में जाकर भिक्षु की तरह रहने लगा। पश्चयताप कर भिक्षु बनना उन्होंने इसलिए स्वीकार किया क्योंकि युद्ध की शुरुआत उनके द्वारा ही कि गई थी। बुद्ध के प्रयासों से युद्ध समाप्त हुआ और दोनों राज्यो के बीच संधि हुई, पर संधि के बदले दक्षिण कोसल के राजा विजयस ने बुद्ध के सामने एक शर्त रखी, उन्होंनो बुद्ध को अपने राज्य की राजधानी श्रीपुर वर्तमान का सिरपुर आने का न्योता दिया। यह शर्त कम और प्राथना ज़्यादा थी। बुद्ध ने भी उनकी प्राथना स्वीकार की व सिरपुर प्रवास किया और बुद्ध सिरपुर में तीन महीनों तक रहे। बुद्ध के उन तीन महीनों का प्रभाव ही है, जो छत्तीसगढ़ में हमे बौद्ध विहार और बुद्ध की कई प्रतिमाएं प्राप्त होती है।

इससे संबंधित एक कथा अवदानशतक में हमे मिलती है, बौद्धों का संस्कृत भाषा में चरितप्रधान साहित्य अवदान शतक (साहित्य) कहलाता है। “अवदान” (प्राकृत अपदान) का अमरकोश के अनुसार अर्थ है – प्राचीन चरित।

चीनी यात्री व्हेनसांग ने सिरपुर की यात्रा की थी, और उसकी यात्रा उल्लेख में इस कथा के तथ्य प्राप्त होते है। उन तथ्यो से “अवदानशतक” की कथा की ऐतिहासिक पुष्टि भी होती है।

और इस तरह कथा समाप्त होती है, बुद्ध के छत्तीसगढ़ कनेक्शन की। जय जोहर, जय छत्तीसगढ़।

लेख एवं छायाचित्र – शुभम थवाईत।

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