छत्तीसगढ़ भाषा साहित्य का आधुनिक युग

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CG Sahitya
Antique pen and inkwell

छत्तीसगढ़ भाषा साहित्य का आधुनिक युग 1900 ” ई. से शुरु होता है। इस युग में साहित्य की अलग-अलग विधाओं का विकास बहुत ही अच्छी तरह से हुआ है।

डॉ. सत्यभामा आड़िल अपनी पुस्तक ” छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य” में लिखती हैं –

“यद्यपि इस आधुनिक युग में गद्य के भी विविध प्रकरों का संवर्धन हुआ है, तथापि काव्य के क्षेत्र में ही महती उपलब्धियाँ दृष्टिगोचर होती हैं।”

छत्तीसगढ़ी साहित्य

पं. सुन्दरलाल शर्मा

पं. सुन्दरलाल शर्मा जो स्वाधीनता संग्रामी थे, वे उच्च कोटी के कवि भी थे। शर्माजी ठेठ छत्तीसगड़ी में काव्य सृजन की थी। पं. सुन्दरलाल शर्मा को महाकवि कहा जाता है।

किशोरावस्था से ही सुन्दरलाल शर्मा जी लिखा करते थे। उन्हें छत्तीसगड़ी और हिन्दी के अलावा संस्कृत, मराठी, बगंला, उड़िया एवं अंग्रेजी आती ती।

हिन्दी और छत्तीसगड़ी में पं. सुन्दरलाल शर्मा ने 21 ग्रन्थों की रचना की। उनकी लिखी “छत्तीसगड़ी दानलीला” आज क्लासिक के रुप में स्वीकृत है।

श्याम से मिलने के लिए गोपियाँ किस तरह व्याकुल हैं, वह निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होता है-

जानेन चेलिक भइन कन्हाई

तेकरे ये चोचला ए दाई।

नंगरा नंगरा फिरत रिहिन हे।

आजेच चेलिक कहाँ भइन हे।

कोन गुरु मेर कान फुँकाइना

बड़े डपोर संख बन आईन

दाई ददा ला जे नई माने।

ते फेर दूसर ला का जानै।

(दानलीला पृ. 17 )

पं. सुन्दरलाल शर्मा का जन्म राजिम में सन् 1881 में हुआ था, “छत्तीसगड़ी दानलीला” में वे अंत में लिखते हैं –

छत्तीस के गढ़ के मझोस एक राजिम सहर,

जहां जतरा महीना मांघ भरेथे।

जहां जतरा महीना मांघ भरेथे।

देस देस गांव गांव के जो रोजगारी भारी,

माल असबाब बेंचे खातिर उतरथें।।

राजा और जमींदार मंडल-किसान

धनवान जहां जुर कै जमात ले निकरथे।

सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै एक

भाई! सनौ तहां कविताई बैठिकरथे।

पं. सुन्दरलाल शर्मा की प्रकाशित कृतियाँ – 1. छत्तीसगढ़ी दानलीला 2. काव्यामृतवर्षिणी 3. राजीव प्रेम-पियूष 4. सीता परिणय 5. पार्वती परिणय 6. प्रल्हाद चरित्र 7. ध्रुव आख्यान 8. करुणा पच्चीसी 9. श्रीकृष्ण जन्म आख्यान 10. सच्चा सरदार 11. विक्रम शशिकला 12. विक्टोरिया वियोग 13. श्री रघुनाथ गुण कीर्तन 14. प्रताप पदावली 15. सतनामी भजनमाला 16. कंस वध।

उनकी छत्तीसगढ़ी रामलीला प्रकाशित नहीं हुई। एक छत्तीसगड़ी मासिक पत्रिका “दुलरुबा” के वे संपादक एवं संचालक थे।

छत्तीसगढ़ी दानलीला से उदघृत ॠंगार वर्णन इत्यादि जो डॉ. सत्यभामा आड़िल ने अपनी पुस्तक “छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य” में उल्लेख की है – (पृ. 91 )

एक जवानी उठती सबेक

पन्दा सोला बीस को

का आंजे अलंगा डारे।

मूड़ कोराये पाटी पारे।।

पांव रचाये बीरा खाये।

तरुवा में टिकली चटकाये।

बड़का टेड़गा खोपा पारे।

गोंदा खोंचे गजरा डारे।।

नगदा लाली मांग लगाये।

बेनी में फुंदरी लटकाये।।

टीका बेंदी अलखन बारे।

रेंगें छाती कुला निकारे।।

कोनो हैं, झाबा गंथवाये।

कोनो जुच्छा बिना कोराये।।

भुतही मन असन रेंगत जावै।

उड़ उड़ चुन्दी मुंह में आवै।।

पहिरे रंग रंग के गहना।

हलहा कोनों अंग रहे ना।।

कोनो गंहिया कोनो तोड़ी।।

कोनों ला घुंघरु बस भावै।।

छुमछुम छुमछुम बाजत जावै।

खुलके ककनी हाथ बिराजै।।

पहिरे बुहंटा अउ पछेला।

जेखर रहिस सीख है जेला।।

बिल्लोरी चूरी हरवाही।

स्तन पिंडरी अउ टिकलाही।।

कोनों छुच्छा लाख बंधाये।।

पिंडरा पटली ला झमकाये।।

पहिरे हे हरियर छुपाहीं।

कोनों छुटुवा कोनों पटाही।।

करघन कंवरपटा पहिरे रेंगत हाथी

जेमा ओरमत जात है, हीरा मोती

चांदी के सूता झमकाये

गोदना हांथ हांथ गोदवाये।।

दुलरी तिलरी कटवा मोहै

ओ कदमाही सुर्रा सोहे।।

पुतरी अऊर जुगजुगी माला।

रुपस मुंगिया पोत विशाला।।

हीरा लाल जड़ाये मुंदरी।

सब झन चक-चकर पहिरे अंगरी

पहिरे परछहा देवराही।

छिनी अंगुरिया अऊ अंगुराही।

खांटिल टिकली ढार बिराजै।

खिनवा लुरकी कानन राजै।।

तोखर खाल्हे झुमका झूलै।

देखत डउकन के दिल भूलै।।

नाकन में सुन्दर नाथ हालै।


नहिं कोऊ अ तोला के खालै।।

कोनों तिरिया पांव रचाये।

लाल महाडर कोनो देवाये।

चुटकी चुटका गोड़ सुहावै।

चुटचुट चुटचुट बाज जावै।।

कोनो अनवट बिछिया दानों।

दंग दंग ले लुच्छा है कोनों।।

रांड़ी समझें पांव निहारै।।

ऊपर एंह बांती मुंह मारै।।

दांतन पाती लाख लगाये।

कोनों मीसी ला झमकाये।।

एक एक के धरे हाथ हैं।

गिजगिज गिजगिज करत जाते हैं।

इन पंक्तियों में प्रसाधन वर्णन, अलंकार वर्णन बड़े सुन्दर से किये गये हैं।

पं. सुन्दरलाल शर्मा का देहान्त सन् 1980 में हुआ था। स्वतन्त्रता सेनानी पं. सुन्दरलाल शर्मा जी देश को आज़ाद नहीं देख पाए।

जाने माने लेखक सुशील यदु, साहित्यकारों के बारे में कह रहे है

पं. बंशीधर शर्मा

पं. बंशीधर शर्मा जी का जन्म सन् 1892 ई. में हुआ था। छत्तीसगढ़ी भाषा के पहले उपन्यासकरा के रुप में जाने जाते हैं। उस उपन्यास का नाम है “हीरु की कहिनी” जो छत्तीसगढ़ी भाषा में पहला उपन्यास था।

सुशील यदु, अपनी पुस्तक ” लोकरंग भाग-2 , छत्तीसगड़ी के साहित्यकार” में लिखते हैं – ” जइसे साहित्य में पं. चन्द्रधर शर्मा गुलेरी हा तीन कहानी लिखकर हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित होगे बइसने बंशीधर पाण्डे जी 1926 में एक छत्तीसगढ़ी लघु उपन्यास ‘हीरु के कहानी’ लिखकर छत्तीसगड़ी साहित्य में अमर होगे। आज उन्हला पहिली छत्तीसगड़ी उपन्यासकार होय के गौरव मिले है।”

बंशीधर पांडे जी साहित्यकार पं. मुकुटधर पाण्डेजी के बड़े भाई और पं. लोचन प्रसाद पाण्डेजी के छोटे बाई थे। उनका लिखा हुआ हिन्दी नाटक का नाम है “विश्वास का फल” एवं उड़िया में लिखी गई गद्य काव्य का नाम है “गजेन्द्र मोक्ष”

कवि गिरिवरदास वैष्णव

कवि गिरिवरदास वैष्णव जी का जन्म 1897 में रायपुर जिला के बलौदाबाजार तहसील के गांव मांचाभाठ में हुआ था। उनके पिता हिन्दी के कवि रहे हैं, और बड़े भाई प्रेमदास वैष्णव भी नियमित रुप से लिखते थे।

गिरिवरदास वैष्णव जी सामाजिक क्रांतिकारी कवि थे। अंग्रेजों के शासन के खिलाफ लिखते थे –

अंगरेजवन मन हमला ठगके

हमर देस मा राज करया

हम कइसे नालायक बेटा

उंखरे आ मान करया।

उनकी प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह “छत्तीसगढ़ी सुनाज” के नाम से प्रकाशित हुई थी। उनकी कविताओं में समाज के झलकियाँ मिलती है। समाज के अंधविश्वास, जातिगत ऊँत-नीच, छुआछूत, सामंत प्रथा इत्यादि के विरोध में लिखते थे।

पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र

पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी जी का जन्म सन् 1908 में बिलासपुर में हुआ था।

शुरु से ही उन्हें छत्तीसगढ़ के लोक परंपराओं और लोकगीतों में रुची थी। शुरु में ब्रजभाषा और खड़ी बोली में रचना करते थे। बाद में छत्तीसगढ़ी में लिखना शुरु किये।

उनकी प्रकाशित पुस्तके हैं – 1. कुछू कांही 2. राम अउ केंवट संग्रह 3. कांग्रेस विजय आल्हा 4. शिव-स्तुति 5. गाँधी गीत 6. फागुन गीत 7. डबकत गीत 8. सुराज गीता 9. क्रांति प्रवेश 10. पंचवर्षीय योजना गीत 11. गोस्वामी तुलसीदास (जीवनी) 12. महाकवि कालिदास कीर्ति 13. छत्तीसगढ़ी साहित्य को डॉ. विनय पाठक की देन।

विप्रजी प्रेम, ॠंगार, देशभक्ति, हास्य व्यंग्य सभी विषयों पर लिखी है।

धमनी हाट

तोला देखे रहेंव गा, तोला देखे रहेंव रे,

धमनी के हाट मां, बोइट तरी रे।

लकर धकर आये होही,

आँखी ला मटकाये।

कइसे जादू करे मोला

सुक्खा मां रिझाये।।

चुन्दी मां तैं चोंगी खोंचे

झुलुप ला बगराये।

चकमक अउ सोल मां तैंय

चोंगी ला सपचाये।।

चोंगी पीये बइठे बइठे

माड़ी ला लमाये।

घेरी बेरी देखे मोला,

दासी मां लोभाये।।

चना मुर्रा लिहे खातिक

मटक के तँय आये।

एक टक निहारे मोला

वही तँय बनाये।।

बोइर तरी बइठे बइहा,

चना मुर्रा खाये।

सुटुर सुटुर रेंगे कइसे

बोले न बताये।।

जात भर ले देखेंव तोला,

आँखी ला गड़ियाये।

भूले भटके तउने दिन ले

धमनी हाट नइ आये।।

तोला देखे रहेंव….

विप्रजी 1962 में चल बसे।

स्व. प्यारेलाल गुप्त

साहित्यकार एवं इतिहासविद् श्री प्यारेलाल गुप्तजी का जन्म सन् 1948 में रतरपुर में हुआ था। गुप्तजी आधुनिक साहित्यकारों के “भीष्म पितामाह” कहे जाते हैं। उनके जैसे इतिहासविद् बहुत कम हुए हैं। उनकी “प्राजीन छत्तीसगढ़” इसकी साक्षी है।

साहित्यिक कृतियाँ – 1. प्राचीन छत्तीसगढ़ 2. बिलासपुर वैभव 3. एक दिन 4. रतीराम का भाग्य सुधार 5. पुष्पहार 6. लवंगलता 7. फ्रान्स राज्यक्रान्ति के इतिहास 8. ग्रीस का इतिहास 9. पं. लोचन प्रसाद पाण्डे ।

गुप्त जी अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी तीनों भाषाओं में बड़े माहिर थे। गांव से उनका बेहद प्रेम था। निम्नलिखित कविता में ये झलकती है –

हमर कतका सुन्दर गांव –

हमर कतका सुन्दर गांव

जइसे लछमि जी के पांव

धर उज्जर लीपे पोते

जेला देख हवेली रोथे

सुध्धर चिकनाये भुइया

चाहे भगत परुस ल गूइया

अंगना मां बइला गरुवा

लकठा मां कोला बारी

जंह बोथन साग तरकारी

ये हर अनपूरना के ठांवा।। हमर

बाहिर मां खातू के गड्डा

जंह गोबर होथे एकट्ठा

धरती ला रसा पियाथे

वोला पीके अन्न उपयाथे

ल देखा हमर कोठार

जहं खरही के गंजे पहार

गये हे गाड़ा बरछा

तेकर लकठा मां हवे मदरसा

जहं नित कुटें नित खांय।। हमर

जहां पक्का घाट बंधाये

चला चला तरइया नहाये

ओ हो, करिया सफ्फा जल

जहं फूले हे लाल कंवल

लकठा मां हय अमरैया

बनवोइर अउर मकैया

फूले हय सरसों पिंवरा

जइसे नवा बहू के लुगरा

जंह घाम लगे न छांव।। हमर

जहाँ जल्दी गिंया नहाई

महदेव ला पानी चढ़ाई

भौजी बर बाबू मंगिहा

“गोई मोर संग झन लगिहा”

“ननदी धीरे धीरे चल

तुंहर हंडुला ले छलकत जल”

कहिके अइसे मुसकाइस

जाना अमरित चंदा बरसाइस

ओला छांड़ कंहू न जांव।। हमर

रवाथे रोज सोंहारी

ओ दे आवत हे पटवारी

झींटी नेस दूबर पातर

तउने च मंदरसा के माषृर

सब्बो के काम चलाथै

फैर दूना ब्याज लगाथै

खेदुवा साव महाजन

जेकर साहुन जइसे बाघिन

जह छल कपट न दुरांव।। हमर

आपस मां होथन राजी

जंह नइये मुकदमा बाजी

भेद भाव नइ जानन

ऊँच नीच नइ जानन

ऊँच नीच नइ मानन

दुख सुख मां एक हो जाथी

जइसे एक दिया दू बाती

चरखा रोज चलाथन

गाँधी के गुन-गाथन

हम लेथन राम के नावा।। हमर

“प्राचीन छत्तीसगढ़” लिखते समय गुप्तजी निरन्तर सात वर्ष तक परिश्रम की थी। इस ग्रन्थ में छत्तीसगढ़ के इतिहास, संस्कृति एवं साहित्य को प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक की भूमिका में श्री प्यारेलाल गुप्त लिखते हैं – “वर्षो की पराधीनता ने हमारे समाज की जीवनशक्ति को नष्ट कर दिया है। फिर भी जो कुछ संभल पाया है, वह हमारे सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक उपादानों के कारण। नये इतिहासकारों को इन जीवन शक्तियों को ढूँढ़ निकालना है। वास्तव में उनके लिए यह एक गंभीर चुनौती है”

प्राचीन छत्तीसगढ़

प्यारेलाल गुप्त

प्रकाश्क – रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर

कोदूराम दलित 

कोदूराम दलित का जन्म सन् 1910 में जिला दुर्ग के टिकरी गांव में हुआ था। गांधीवादी कोदूराम प्राइमरी स्कूल के मास्टर थे उनकी रचनायें करीब 800 (आठ सौ) है पर ज्यादातर अप्रकाशित हैं। कवि सम्मेलन में कोदूराम जी अपनी हास्य व्यंग्य रचनाएँ सुनाकर सबको बेहद हँसाते थे। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का प्रयोग बड़े स्वाभाविक और सुन्दर तरीके से हुआ करता था। उनकी रचनायें – 1. सियानी गोठ 2. कनवा समधी 3. अलहन 4. दू मितान 5. हमर देस 6. कृष्ण जन्म 7. बाल निबंध 8. कथा कहानी 9. छत्तीसगढ़ी शब्द भंडार अउ लोकोक्ति।

उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ का गांव का जीवन बड़ा सुन्दर झलकता है – चऊ मास

(1)

घाम-दिन गइस, आइस बरखा के दिन

सनन-सनन चले पवन लहरिया।

छाये रथ अकास-मां, चारों खूंट धुंवा साही

बरखा के बादर निच्चट भिम्म करिया।।

चमकय बिजली, गरजे घन घेरी-बेरी

बससे मूसर-धार पानी छर छरिया।

भर गें खाई-खोधरा, कुंवा डोली-डांगर “औ”

टिप टिप ले भरगे-नदी, नरवा, तरिया।।

(2)

गीले होगे मांटी, चिखला बनिस धुरी हर,

बपुरी बसुधा के बुताइस पियास हर।

हरियागे भुइयां सुग्धर मखेलमलसाही,

जामिस हे बन, उल्होइस कांदी-घास हर।।

जोहत रहिन गंज दिन ले जेकर बांट,

खेतिहर-मन के पूरन होगे आस हर।

सुरुज लजा के झांके बपुरा-ह-कभू-कभू,

“रस-बरसइया आइस चउमास हर”।।

(3)

ढोलक बजायैं, मस्त होके आल्हा गाय रोज,

इहां-उहां कतको गंवइया-सहरिया,

रुख तरी जायें, झुला झूलैं सुख पायं अड,

कजरी-मल्हार खुब सुनाय सुन्दरिया।।

नांगर चलायं खेत जा-जाके किसान-मन,

बोवयं धान-कोदो, गावैं करमा ददरिया।

कभू नहीं ओढ़े छाता, उन झड़ी झांकर मां,

कोन्हो ओढ़े बोरा, कोन्हों कमरा-खुमरिया।।

(4)

बाढिन गजब मांछी, बत्तर-कीरा “ओ” फांफा,

झिंगरुवा, किरवा, गेंगरुवा, अँसोढिया।

पानी-मां मउज करें-मेचका, किंभदोल, धोंधी।

केंकरा, केंछुवा, जोंक मछरी अउ ढोंड़िया।।

अंधियारी रतिहा मां अड़बड़ निकलयं,

बड़ बिखहर बिच्छी, सांप-चरगोरिया।

कनखजूरा-पताड़ा, सतबूंदिया “ओ” गोेहेह,

मुंह लेड़ी, धूर, नांग, कंरायत कौड़ीया।।

(5)

भाजी टोरे बर खेत-खार “औ” बियारा जाये,

नान-नान टूरा-टूरी मन घर-घर के।

केनी, मुसकेनी, गुंड़रु, चरोटा, पथरिया,

मंछरिया भाजी लायं ओली भर भर के।।

मछरी मारे ला जायं ढीमर-केंवट मन,

तरिया “औ” नदिया मां फांदा धर-धर के।

खोखसी, पढ़ीना, टेंगना, कोतरी, बाम्बी धरे,

ढूंटी-मां भरत जायं साफ कर-कर के।।

(6)

धान-कोदी, राहेर, जुवारी-जोंधरी कपसा

तिली, सन-वन बोए जाथे इही ॠतु-मां।

बतर-बियासी अउ निंदई-कोड़ई कर,

बनिहार मन बनी पाथें इही ॠतु मां।।

हरेली, नाग पंचमी, राखी, आठे, तीजा-पोरा

गनेस-बिहार, सब आथें इही ॠतु मां।

गाय-गोरु मन धरसा-मां जाके हरियर,

हरियर चारा बने खायें इही ॠतु मां।।

(7)

देखे के लाइक रथे जाके तो देखो चिटिक,

बारी-बखरी ला सोनकर को मरार के।

जरी, खोटनी, अमारी, चेंच, चउंलई भाजी,

बोये हवें डूंहडू ला सुग्धर सुधार के।।

मांदा मां बोये हे भांटा, रमकेरिया, मुरई,

चुटचुटिया, मिरची खातू-डार-डार के।

करेला, तरोई, खीरा, सेमी बरबटी अउ,

ढेंखरा गड़े हवंय कुम्हड़ा केनार के।।

(8)

कभू केउ दिन-ले तोपाये रथे बादर-ह,

कभू केउ दिन-ले-झड़ी-ह हरि जाथे जी।

सहे नहीं जाय, धुंका-पानी के बिकट मार,

जाड़ लगे, गोरसी के सुखा-ह-आथेजी।।

ये बेरा में भूंजे जना, बटुरा औ बांचे होरा,

बने बने चीज-बस खाये बर भाथें जी।

इन्दर धनुष के केतक के बखान करौ,

सतरङ्ग अकास के शोभा ला बढ़ाये जी।

(9)

ककरों चुहय छानी, भीतिया गिरे ककरो,

ककरो गिरे झोपड़ी कुरिया मकान हर,

सींड़ आय, भुइयां-भीतिया-मन ओद्य होयं,

छानी-ह टूटे ककरो टूटे दूकान हर।।

सरलग पानी आय-बीज सड़ जाय-अड,

तिपौ अघात तो भताय बोये धान हर,

बइहा पूरा हर बिनास करै खेती-पबारी,

जिये कोन किसिम-में बपुरा किसान हर?

(10)

बिछलाहा भुइयां के रेंगई-ला पूंछो झन,

कोन्हों मन बिछलथें, कोन्हों मन गरिथें।

मउसम बहलिस, नवा-जुन्ना पानी पीके,

जूड़-सरदी के मारे कोन्हों मन मरथें।।

कोन्हों मांछी-मारथे, कोन्हों मन खेदारथें तो,

कोन्हों धुंकी धररा के नावे सुन डरथें।

कोन्हों-कोन्हों मन म�

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