छत्तीसगढ़ का शिमला है मैनपाट

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छत्तीसगढ़ के मैनपाट की वादियां शिमला का अहसास दिलाती हैं, खासकर सावन और सर्दियों के मौसम में। प्रकृति की अनुपम छटाओं से परिपूर्ण मैनपाट को सावन में बादल घेरे रहते हैं। लगता है, जैसे आकाश से बादल धरा पर उतर रहे हों। मैनपाट समुद्र तल से करीब 3781 फीट ऊंचे स्थान पर बसा है। यहां बारहों महीने मौसम सुहाना रहता है, बारिश के दिनों में बादल जमीन के एकदम करीब आ जाते हैं वहीं सर्दियों में पूरा इलाका  कोहरे से ढंक जाता है। चारों तरफ हरियाली और खुशनुमा मौसम की वजह से मैनपाट को छत्तीसगढ़ का शिमला भी कहा जाता है। हर साल हजारों सैलानी यहां पहुंचते हैं। रिमझिम फुहारों के बीच इस अनुपम छटा को देखने पहुंचे पर्यटकों की जुबां से निकलता है…वाकई यह शिमला से कम नहीं है।

सहायक मौसम वैज्ञानिक एएम भट्ट कहते हैं कि उत्तरी छत्तीसगढ़ के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बनने के कारण बादल काफी नीचे आ जाते हैं। मैनपाट में पहाड़ियों से बादलों के टकराने के कारण यह नजारा देखने को मिलता है। मैनपाट के ऊपरी क्षेत्र में बादल इन दिनों जमीन के एकदम नजदीक आ गए हैं। बादलों के धरा के नजदीक आ जाने से धुंध सा नजारा है और रिमझिम फुहारें हर किसी का मन मोह रही हैं। इस अद्भुत नजारे को देखने के लिए सरगुजावासियों के मैनपाट आने-जाने का क्रम इन दिनों और बढ़ गया है।

मैनपाट की वादियां यों तो पहले से ही खूबसूरत हैं, लेकिन बादलों की वजह से इसकी खूबसूरती में चार चांद लग गए हैं। शिमला, कुल्लू-मनाली जैसे पर्यटन स्थलों में प्रकृति की अनुपम छटा देख चुके लोग जब मैनपाट की वादियों को देखते हैं तो इसकी तुलना शिमला से करते हैं।

अंबिकापुर से दरिमा होते हुए मैनपाट जाने का रास्ता है। मार्ग में जैसे-जैसे चढ़ाई ऊपर होती जाती है, सड़क के दोनों ओर साल के घने जंगल अनायास ही लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। सावन में बादलों के कारण इसकी खूबसूरती और बढ़ जाती है।

मैनपाट के लोगों का कहना है कि ठंड के दिनों में भी ऐसा नजारा अक्सर देखने को मिलता है। सुबह काफी देर तक घना कोहरा छाया रहता है और दोपहर में भी धूप के बावजूद उष्णता का अहसास नहीं होता। लेकिन जुलाई महीने में मैनपाट में ऐसा नजारा देख पर्यटक अचंभित रह जाते हैं।

बादलों के काफी नीचे आ जाने के कारण सड़क ज्यादा दूर तक नजर नहीं आती। लोगों को सावधानी से वाहन चलाना पड़ता है। रिमझिम फुहारों के कारण कई स्थानों पर तो दिन में भी वाहनों की लाइट जलाने की जरूररत पड़ जाती है।

बादलों से घिरे मैनपाट के दर्शनीय स्थल हैं दलदली, टाइगर प्वाइंट और फिश प्वाइंट, जहां पहुंचकर लोग बादलों को नजदीक से देखने का नया अनुभव प्राप्त कर सकते हैं।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थल मैनपाट में सुविधाओं की अब कमी नहीं रह गई है। मैनपाट पहुंचने का मार्ग भी पहले से बेहतर हो गया है। अंबिकापुर से दरिमा होते हुए कमलेश्वरपुर तक पक्की घुमावदार सड़क और दोनों ओर घने जंगल मैनपाट पहुंचने से पहले ही हर किसी को प्रफुल्लित कर देते हैं।

इसे मिनी तिब्बत भी कहा जाता है

आज से ठीक 26 साल पहले 10 दिसंबर को बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा को नोबल पीस प्राइज दिया गया था। दलाई लामा का जन्म तिब्बत में हुआ था और सिरपुर में दुनिया का सबसे बड़ा बौद्ध स्थल होने की वजह से उनका छत्तीसगढ़ से विशेष लगाव है। उन्हें नोबल पुरस्कार मिलने के 26 साल पूरे होने के अवसर पर हम बता रहे हैं छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जिले में स्थित मैनपाट के बारे में जिसे मिनी तिब्बत के नाम से जाना जाता है। यहां के मठ-मंदिर, लोग, खान-पान, संस्कृति सब कुछ तिब्बत के जैसे हैं।

चीन के कब्जे के बाद पहुंचे यहां
10 मार्च 1959 को तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद भारत के जिन पांच इलाकों में तिब्बती शरणार्थियों ने अपना घर-परिवार बसाया, उसमें एक मैनपाट है। मैनपाट के अलग-अलग कैंपों में रहने वाले ये तिब्बती यहां टाऊ, मक्का और आलू की खेती करते हैं। यहां पर सरकार की ओर से हर परिवार को सात-सात एकड़ खेत दिए गए थे ताकि खेती से उनकी आजीविका चल सके। खेती के काम के लिए आसपास के गांवों के आदिवासी मजदूर यहां आते हैं।

चौथी पीढ़ी रह रही अब
शुरुआत में करीब 22 सौ लोगों को यहां लाकर बसाया गया था। अब यहां तीसरी और चौथी पीढ़ी रह रही है लेकिन आबादी कमोबेश उतनी ही बनी हुई है क्योंकि एक तो पुरानी पीढ़ी के लोग बचे नहीं और नई पीढ़ी का बड़ा हिस्सा बाहर चला गया है। लेकिन पुरानी पीढ़ी के जो लोग यहां बचे हैं वो यहां खुश हैं और यहीं रहना चाहते हैं।

अलग-अलग व्यवसाय करते हैं
खेती करने के अलावा तिब्बती स्थानीय स्तर पर आजीविका के लिए कुछ और काम भी करते हैं। मसलन पॉमेरियन कुत्ता पालना और कालीन बुनना। युवा ठंड के दिनों में ऊनी कपड़े का व्यवसाय करने बाहर चले जाते हैं और तीन महीने घूम-घूमकर व्यवसाय करते हैं। बच्चों के पढऩे के लिए यहां केंद्र सरकार की ओर से विशेष केंद्रीय स्कूल खोले गए हैं। तिब्बतियों के बच्चे इस स्कूल में आठवीं तक की पढ़ाई करते हैं। इसके बाद की पढ़ाई के लिए या तो वे धर्मशाला चले जाते हैं या फिर हिमाचल प्रदेश में डलहौजी या शिमला। यहां सभी कैंपों में मॉनेस्ट्री यानी बौद्ध मंदिर बने हुए हैं और जहां तिब्बती ईश्वर के ध्यान में लीन दिखाई देते हैं।

पर्यटन विभाग ने पर्यटकों के लिए यहां एक होटल भी बनवा दिया है। इसके अलावा कुछ निजी रिसोर्ट और गेस्ट हाउस भी ठहरने के लिए उपलब्ध हैं। यही वजह है कि अब सालभर न सिर्फ सरगुजा, बल्कि प्रदेश के दूसरे कोने से भी पर्यटक यहां की खूबसूरत वादियों को देखने और प्रकृति को करीब से जानने के लिए पहुंचते हैं।

 

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