टीम इंडिया के राष्ट्रीय खिलाड़ी को ‘सूरमा’ बनाती है दिलजीत की फिल्म

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निर्माताः चित्रांगदा सिंह/दीपक सिंह

निर्देशकः शाद अली
सितारेः दिलजीत दोसांज, तापसी पन्नू, अंगद बेदी, विजय राज, सतीश कौशिक, कुलभूषण खरबंदा
रेटिंग **1/2

इधर वर्ड कप फुटबॉल की बयार चल रही है और उधर इंडिया-इंग्लैंड क्रिकेट की हवा है। जबकि अब आपके नजदीकी नॉन एसी और एसी सिनेमाघरों में है हॉकी का खेल चल रहा है मैदान पर प्रतिद्वंद्वी पाले के डी में घुस कर अपने ड्रेग फ्लिक से चौंका देने वाले संदीप सिंह की बायोपिक सूरमा उनके लिए है जो जिंदगी से लड़ कर अपने हक छीनने के इरादे रखते हैं।
पिछली दो-तीन फिल्मों में दर्शकों का दिल किल करने वाले निर्देशक शाद अली सूरमा में पुराने जख्मों पर कुछ मरहम लगाते हैं। इधर, बॉलीवुड में बायोपिक फिल्मों की बहार आई हुई है। जिंदगी जीने की जद्दोजहद में पस्त हो रही जनता को सिनेमा प्रेरणा के डोज दे रहा है। सेल्फ हेल्प किताबों के बाद आप इसे सेल्फ हेल्प सिनेमा कह सकते हैं। जिसका साफ-सीधा संदेश हैः थक जाना नहीं तू कहीं हार के।

सूरमा का पहला हिस्सा धीमा है लेकिन दूसरे में कुछ रोमांच है

सूरमा संदीप सिंह (दिलजीत दोसांज) की कहानी है जिसके गांव का बच्चा-बच्चा हॉकी चैंपियन बनना चाहता है। संदीप का भी यह सपना है लेकिन कोच की वजह से वह खेल से दूर हो जाता है। समय का पहिया घूमता है और हॉकी की खूबसूरत खिलाड़ी हरप्रीत/प्रीतो का प्यार उसे मैदान में लौटाता है। राष्ट्रीय टीम, मैदान में कप्तानी और अर्जुन अवार्ड के साथ कहानी बढ़ती है और इंटरवेल के पहले तीखा मोड़ आता है। रेल में बैठे संदीप को अचानक एक गोली आ लगती है! हादसे में उसकी कमर के नीचे का शरीर निष्क्रिय हो जाता है और तब शुरू होती है मैदान और जिंदगी की रेस में संदीप की वापसी की जंग। सूरमा का पहला हिस्सा धीमा है लेकिन दूसरे में कुछ रोमांच है। जिसे दिलजीत दोसांज अपने बढ़िया परफॉरमेंस से बनाए रखते हैं। दिलजीत किरदार की गहराई में उतर कर उसे पर्दे पर जीवंत बनाते हैं। उनके बड़े भाई बिक्रमजीत के रूप में अंगद बेदी जमे हैं।

संदीप के घायल होने के बाद हरप्रीत से उनके संबंध की कहानी रोचक है

कुछ दृश्यों में दोनों भाईयों का प्यार और कठिन वक्त से मुठभेड़ में साथ खड़े होना फिल्म को संजीदा बनाता है। कोच के रोल में विजय राज जमे हैं और अपने अंदाज में कहे उनके संवाद रोचक हैं। हरप्रीत के रूप में तापसी पन्नू संदीप की कहानी बयान कर रही हैं और वह राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी बनी हैं परंतु निर्देशक ने उनकी इस प्रतिभा की झलक भर दिखाई। संदीप के घायल होने के बाद हरप्रीत से उनके संबंध की कहानी रोचक है।

बायोपिक फिल्मों की समस्या यह है कि थोड़ी कहानी के बाद ये डॉक्युमेंट्री की तरह हो जाती हैं। दर्शक से भावनात्मक लगाव टूट जाता है और बात सूचना पर आ जाती है। यह मुश्किल सूरमा में भी है। एक समय के बाद संदीप के जीवन की घटनाएं और उपलब्धियां ही दर्ज होती जाती हैं। शाद के लिए राहत की बात यही है कि सूरमा उनकी पिछली फिल्मों झूम बराबर झूम, किल दिल और ओके जानू से कहीं औचित्यपूर्ण है।

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