हल्बी कविता गाँव चो सुरता अएसे

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||गाँव चो सुरता अएसे||

रुक-राई,नंदी-डोंगरी चे,
मचों नंजर ने दखा दयसे.
गाँव ले रहुन लाफी,
गाँव चो सुरता अएसे.

उठला बे बिहाने संजकरी सबाय झन,
जसन कुकड़ा बासली,गागला चड़ई पीला.
डौकी मन घर के बहारला अउर,
गोबर घोरुन दुआर के,काय मंजा छड़ा दीला.

आया बले उठुन,अँधारे-अँधार निकरली बे,
गपली धरुन खमन बाट,बोड़ा-फुटु बुलुक.
बाबा बले नीलो बे,बैला-नाँगर,जुआँड़ी-जोता,
तुरिया नाहलेक माई धान,बेड़ा ने बुनुक.

आठेक बजे बोहड़ली बे आया घरे,
आनली बे पान-दतुन,बोड़ा-फुटु बाँस्ता,बोदी भाजी.
चुड़ली बे घरे बोड़ा-बेसन चो आमट,
काय सुँदर सुका बाँस्ता,नाहलेक फुटु संग झीर्रा भाजी.

बारा एक बजे बाबा बले इलो बे घरे ,
बेटी-बोहारी मन दीला बे पतरी ने,
साग-भात सबके बाटुन-बाटुन.
खादला बे सबाय झन,
काय मंजा आजि फेरे नुआ साग,
अंडकीमन के चाटुन-चाटुन.

आजी काल तो आय,
खेती कमानी चो मोहका.
फोकट नी रहोत एबे,
कोनी डौकी-डौका.

सकत भर बेड़ा ने,
काम-बुता करसोत.
जोंधरा बीजा जगासोत,
अउर बेड़ा ने थरहा लगासोत.

अउर मँय आँसें इता सहरे,
एक ठान खोली ने ढाकी होउन.
सुरता करेंसे रोजे गाँव के,
सोउन-उठुन-बसुन.

साग-भात,सब मिरेसे इता पयसा ने,
मान्तर आया,जे सुआद आसे नइ,
तुचो राँधलो झीर्रा भाजी ने.
हुसन सुआद कहाँ मिरे मके,इता चो,
साँभर-इडली-डोसा,चाउमीन,पाव भाजी ने.

ए पलासटिक चो पानी के,
पियुक नी भाए.
मैं झटके बोहड़ेंदे रे!मचो गाँव,
तुचो बिगर मके जियुन नी भाए.


अशोक नेताम”बस्तरिया”

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