अंधेरे में डूबे गांवों को इस वैज्ञानिक ने ऐसे किया रोशन

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dr Punit

कहते हैं, जब लक्ष्य तय हो और संकल्प दृढ़ तो सफलता की राह में कोई बाधा आड़े नहीं आ पाती। बेंगलुरु के वैज्ञानिक डॉ. पुनीत सिंह की दस साल की तपस्या का फलित होना इसका प्रमाण है। उनके आविष्कार बिना ईंधन के चलने वाले रैम पंप से बस्तर के अंदरूनी गांव टाइपदर के पहाड़ी नाले का पानी खेतों तक पहुंचने लगा है।

वहीं कम बहाव वाले नाले से भी बिजली पैदा कर देने की क्षमता वाले विशेष माइक्रोहाइड्रो टरबाइन से रातभर घुप अंधेरे में डूबे रहने वाले सैकड़ों घर जल्द ही रोशन होने जा रहे हैं। इतना ही नहीं, इससे बड़े रकबे में सिंचाई भी हो सकेगी।

डॉ. पुनीत की कहानी उन युवाओं को आइना दिखाती है, जो रुपये कमाने की अंधी दौड़ में अपनी प्रतिभा और क्षमता को गैर मुल्कों में गिरवी रख देते हैं। जर्मनी में शोध के दौरान उन्होंने माइक्रोहाइड्रो टरबाइन व बिना ईंधन से चलने वाले रैम पंप का आविष्कार किया था।

उनकी प्रतिभा देख जर्मनी सरकार ने करोड़ों रुपये का प्रस्ताव देकर उन्हें अपना बना लेना चाहा, लेकिन माटी के इस लाल को अपना देश, अपने देश के गरीब आदिवासी प्यारे थे। स्वदेश के अंधियारे गांवों को रोशन करने के लिए उसने जर्मनी का जगमगाता प्रस्ताव ठुकरा दिया।

अब उनकी देशभक्ति ने जर्मनी सरकार का दिल जीत लिया। शोध पूरा होने के बाद वापसी के दौरान वहां की सरकार ने करीब चार करोड़ रुपये खर्च कर माइक्रोहाइड्रो टरबाइन तैयार करवाया और उन्हें भेंट कर दिया। इतना ही नहीं, जल मार्ग से मुंबई तक ढुलाई का खर्च भी जर्मनी ने ही उठाया।

खुद खर्च कर चुके करोड़ रुपया

बयालीस वर्षीय डॉ. पुनीत इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बेंगलुरु में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। बस्तर के माचकोट वन परिक्षेत्र के ग्राम टाइपदर के गणेशबहार नाले पर वे करीब दस साल से अपना प्रोजेक्ट चला रहे हैं। फाउंडेशन, कच्चा चेकडैम, पाइप लाइन विस्तार आदि पर वे खुद का करीब 80 लाख रुपया खर्च कर चुके हैं। इस प्रोजेक्ट में प्रशासन की ओर से किसी प्रकार की मदद नहीं मिलने से देरी हुई। लेकिन अब वे उत्साहित हैं। कच्चे चेकडैम को पक्का और ऊंचा करने के लिए प्रशासन 50 लाख रुपये खर्च करने जा रहा है।

नाले में शुरू हुआ हाइड्रोलिक रैम पंप

डॉ. पुनीत ने चेकडैम से करीब सौ मीटर आगे नाले पर रैम पंप स्थापित किया है। यह पंप नाले का मात्र पांच फीसद पानी ही लिफ्ट करता है। 95 फीसद पानी नाले में वापस चला जाता है। फिलहाल यह पंप प्रति सेकंड साढ़े तीन लीटर पानी दे रहा है, जिसे आवश्यकतानुसार पांच लीटर तक बढ़ाया जा सकता है। नाले में पानी चढ़ते ही यह पंप स्वतः बंद हो जाएगा और उतरते ही चालू।

जल्द ही स्थापित होगा माइक्रोहाइड्रो टरबाइन

वे बताते हैं कि चेकडैम पक्का होते ही नाले पर माइक्रोहाइड्रो टरबाइन स्थापित कर दिया जाएगा। यह एक साथ दो काम करेगा। पहला हिस्सा 50 किलोवॉट बिजली पैदा करेगा, जिससे घरों में बिजली के उपकरणों के अलावा हॉलर मिल और आटा चक्की आदि भी चल सकेंगे। वहीं दूसरी हिस्सा सिंचाई पंप की तरह काम करेगा, जिससे सैकड़ों एकड़ खेतों में पानी पहुंचेगा। वे कहते हैं कि आगामी गर्मी में यहां किसानों के खेतों में हरियाली ही हरियाली नजर आएगी।

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